BREAKING: APAAR ID पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पूरे देश में लागू होगा ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश; जानें छात्रों के लिए क्या हैं मायने

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**लीड पैरा:** डिजिटल इंडिया के दौर में छात्रों की पहचान से जुड़े 'APAAR ID' (Automated Permanent Academic Account Registry) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस महत्वपूर्ण निर्देश को पूरे भारत में लागू करने का आदेश दिया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि छात्रों से APAAR ID के लिए अनिवार्य सहमति (Consent) लेना अनिवार्य है। यह फैसला लाखों छात्रों की डेटा गोपनीयता (Data Privacy) और निजता के अधिकार के लिहाज से एक बड़े मील का पत्थर माना जा रहा है।

BREAKING: APAAR ID पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला,

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क्या हुआ / WHAT HAPPENED सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वे APAAR ID के पंजीकरण के लिए ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करें। असल में, यह पूरा मामला छात्रों के 'आधार-आधारित' शैक्षणिक डेटाबेस से जुड़ा है। ओडिशा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में यह स्पष्ट किया था कि किसी भी छात्र को APAAR ID लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और इसके लिए माता-पिता या अभिभावक की 'सूचित सहमति' (Informed Consent) अनिवार्य होनी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने को कहा है, जिससे शिक्षा मंत्रालय की डिजिटल योजना में डेटा सुरक्षा का दायरा और कड़ा हो गया है।

पृष्ठभूमि / BACKGROUND APAAR ID को 'वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी' के रूप में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड, डिग्री, क्रेडिट स्कोर और अन्य उपलब्धियों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना है। हालांकि, शुरुआत से ही 'इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन' (IFF) और कई शिक्षाविदों ने इस पर चिंता जताई थी। उनका तर्क था कि बिना पर्याप्त सुरक्षा मानकों और सहमति के इतनी बड़ी मात्रा में बच्चों का डेटा इकट्ठा करना जोखिम भरा हो सकता है। ओडिशा में इसे लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य के स्कूलों में इसे अनिवार्य बनाने की खबरें आईं, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा था।

आधिकारिक बयान / OFFICIAL STATEMENTS ओडिशा में **मोहन चरण माझी** के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने इस मामले पर सतर्क रुख अपनाया है। राज्य के शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह से पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा, "हम केंद्र के डिजिटल इंडिया मिशन का समर्थन करते हैं, लेकिन छात्रों की निजता हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट है कि सहमति को अनिवार्य बनाया जाए, और हम अपने राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों को इसी अनुरूप निर्देश जारी कर रहे हैं।"

राजनीतिक प्रतिक्रिया / POLITICAL REACTIONS इस मसले पर राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज है। * **बीजेपी (ओडिशा):** सत्ताधारी दल का कहना है कि यह निर्णय पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया कदम है, जिससे छात्रों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाया जाएगा। * **विपक्ष (बीजद और कांग्रेस):** विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार जल्दबाजी में डेटा एकत्र कर रही थी। विपक्ष का कहना है, "यह हमारी जीत है कि कोर्ट ने सरकार की मनमानी पर रोक लगाई है। छात्रों का डेटा सुरक्षित रहना चाहिए और जबरदस्ती स्वीकार्य नहीं है।"

कानूनी कार्रवाई / LEGAL ACTION सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश **इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF)** द्वारा उठाई गई चिंताओं के बाद आया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि: 1. APAAR ID का पंजीकरण पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) होगा। 2. स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सहमति पत्र में डेटा के उपयोग का उद्देश्य स्पष्ट रूप से लिखा हो। 3. किसी भी छात्र को आईडी न बनाने के कारण स्कूल में प्रवेश या परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश 'पुट्टास्वामी फैसले' (निजता का अधिकार) के अनुरूप है।

विशेषज्ञ विश्लेषण / EXPERT ANALYSIS साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप एक 'चेक एंड बैलेंस' की तरह है। शिक्षा के डिजिटलीकरण के लिए डेटा जरूरी है, लेकिन बच्चों का डेटा 'सेंसिटिव' होता है। विशेषज्ञ कहते हैं, "यदि सहमति (Consent) का विकल्प नहीं होता, तो भविष्य में डेटा लीक होने पर जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता। अब स्कूलों को डेटा प्रबंधन के लिए अधिक जिम्मेदार होना पड़ेगा।"

आगे क्या / WHAT NEXT अब गेंद केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय के पाले में है। मंत्रालय को सभी राज्यों को एक नया SOP (Standard Operating Procedure) जारी करना होगा। आगामी शैक्षणिक सत्र में प्रवेश के दौरान, स्कूलों को अब एक 'कंसेंट फॉर्म' छात्रों को देना होगा, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि डेटा कहां स्टोर होगा और उसका उपयोग कौन करेगा। ओडिशा के मुख्यमंत्री **मोहन चरण माझी** की सरकार इस पर जल्द ही एक राज्य-स्तरीय कार्यशाला आयोजित करने की योजना बना रही है ताकि शिक्षकों को इस नई प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित किया जा सके।

**निष्कर्ष:** सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश डिजिटल गवर्नेंस और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच एक संतुलन स्थापित करता है। जहां एक तरफ देश शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों की निजता की सुरक्षा अब कानूनी रूप से अनिवार्य हो गई है। यह फैसला आने वाले समय में अन्य डिजिटल पहचान योजनाओं के लिए भी एक मानक (Precedent) का काम करेगा।

Source: Google News

*Source: Google News — foolpolitics.in*

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