BREAKING: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! रेप और POCSO मामलों के ट्रायल पर जारी की सख्त गाइडलाइंस, तय की डेडलाइन
BREAKING: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! रेप और POCSO मामलों के ट्रायल पर जारी की सख्त गाइडलाइंस, तय की डेडलाइन
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मद्रास उच्च न्यायालय ने महिलाओं और नाबालिग बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों और पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े मुकदमों के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि मुकदमों में लंबा खिंचाव पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य और न्याय प्रणाली के भरोसे को तोड़ता है, लिहाजा जांच एजेंसियों से लेकर विशेष अदालतों तक को तय समय-सीमा के भीतर ट्रायल पूरा करना अनिवार्य होगा।
क्या हुआ / WHAT HAPPENED
मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु और पुडुचेरी में लंबित पड़े दुष्कर्म (Rape) और पॉक्सो (POCSO) मामलों की समीक्षा के दौरान यह पाया कि कानूनों में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद मुकदमों की सुनवाई वर्षों तक लटक रही है। अदालत ने न्यायिक अधिकारियों, विशेष लोक अभियोजकों (Special Public Prosecutors), पुलिस जांच अधिकारियों और फॉरेंसिक लैब्स के लिए चरणबद्ध गाइडलाइंस जारी की हैं।
अदालत ने अपने निर्देशों में स्पष्ट किया है: * **जांच की समय-सीमा:** यौन उत्पीड़न और पॉक्सो मामलों में एफआईआर दर्ज होने के अधिकतम **60 दिनों (2 महीने)** के भीतर जांच पूरी कर आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया जाए। * **ट्रायल की अवधि:** पॉक्सो अधिनियम की धारा 35 के तहत संज्ञान लेने की तारीख से **1 वर्ष के भीतर** मुकदमे की सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाया जाए। * **फॉरेंसिक रिपोर्ट में तेजी:** फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्रीज (FSL) और डीएनए (DNA) प्रोफाइलिंग रिपोर्ट को अनावश्यक रूप से न रोका जाए; इसके लिए प्राथमिकता के आधार पर रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी जाए। * **पीड़िता की सुरक्षा और मुआवजा:** पीड़िता के बयान दर्ज करते समय बाल-अनुकूल (child-friendly) वातावरण सुनिश्चित हो और अंतरिम मुआवजा (Interim Compensation) बिना देरी जारी किया जाए।
पृष्ठभूमि / BACKGROUND
भारत में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के लिए वर्ष **2012** में पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences) कानून लागू किया गया था। इस कानून की धारा 35 में यह वैधानिक रूप से अनिवार्य किया गया था कि बच्चे का बयान दर्ज करने की प्रक्रिया और मुकदमे की सुनवाई संज्ञान लेने के एक साल के भीतर खत्म होनी चाहिए।
हालांकि, देश भर की अदालतों की तरह तमिलनाडु में भी मुकदमों का भारी बैकलॉग देखा गया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) और विभिन्न न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार, देशभर में पॉक्सो मामलों की पेंडेंसी दर 80 से 90 प्रतिशत के आसपास बनी रहती है। मद्रास हाईकोर्ट के संज्ञान में ऐसे कई मामले आए जहां चार्जशीट दाखिल होने के 3 से 5 साल बाद भी गवाहों के बयान तक पूरे नहीं हो सके थे। इसी स्थिति को बदलने के लिए अदालत ने स्वतः संज्ञान और संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह वृहद आदेश पारित किया है।
आधिकारिक बयान और कोर्ट की टिप्पणियां / OFFICIAL STATEMENTS
मद्रास उच्च न्यायालय की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा: > *"यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता को अदालत के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करना न्याय प्रणाली की विफलता को दर्शाता है। न्याय में देरी वास्तव में न्याय से वंचित करने जैसा है। पॉक्सो और दुष्कर्म मामलों में त्वरित सुनवाई कोई विकल्प नहीं, बल्कि पीड़ित का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है।"*
अदालत ने पुलिस महानिदेशक (DGP) और न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि वे पुलिसकर्मियों और जजों को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित प्रशिक्षण सत्र आयोजित करें। विशेष अदालतों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे अभियुक्त पक्ष की ओर से बेवजह तारीखें (Adjournments) मांगने की रणनीति पर सख्ती से रोक लगाएं।
राजनीतिक और प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य / REGIONAL CONTEXT & REACTIONS
यह पूरा मामला **तमिलनाडु** राज्य से संबंधित है, जहाँ वर्तमान में **द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)** की सरकार है और **एम.के. स्टालिन (M.K. Stalin)** मुख्यमंत्री हैं। राज्य के कानून मंत्री **एस. रघुपति (S. Regupathy)** हैं।
* **राज्य सरकार का रुख:** तमिलनाडु सरकार के अभियोजन पक्ष ने अदालत को भरोसा दिलाया कि राज्य में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs) के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है और डीएनए सैंपलिंग के लिए अतिरिक्त फॉरेंसिक सुविधाओं को मंजूरी दी जा रही है। * **विपक्ष की प्रतिक्रिया:** राज्य में मुख्य विपक्षी दल **एआईएडीएमके (AIADMK)** और **भारतीय जनता पार्टी (BJP)** ने इस फैसले का स्वागत करते हुए राज्य सरकार पर महिला सुरक्षा और त्वरित न्याय के मोर्चे पर बुनियादी ढांचे में तेजी लाने का दबाव बनाया है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि फॉरेंसिक लैब्स में स्टाफ की कमी और पुलिस जांच में ढिलाई के चलते मामलों में देरी होती है।
कानूनी कार्रवाई और नई गाइडलाइंस / LEGAL GUIDELINES
मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स और पुलिस प्रशासन के लिए विस्तृत कार्ययोजना निर्धारित की है:
* **समन और वारंट का त्वरित तामीला:** पुलिस को निर्देश दिया गया है कि गवाहों और डॉक्टरों के समन को प्राथमिकता पर तामील कराया जाए, ताकि सुनवाई स्थगित न हो। * **कैमरा ट्रायल और पहचान की गोपनीयता:** पीड़िता की पहचान किसी भी स्तर पर उजागर न हो, इसे सख्ती से लागू किया जाए। कोर्ट में पीड़िता का सामना आरोपी से सीधे न हो, इसके लिए स्क्रीन या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था अनिवार्य हो। * **स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट (SJPU):** हर जिले में बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों (CWPO) और एसजेपीयू को सक्रिय भूमिका निभाने का आदेश दिया गया है। * **मुआवजा योजना:** राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (TNSLSA) को निर्देश दिया गया है कि पीड़िता को तत्काल वित्तीय और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
विशेषज्ञ विश्लेषण / EXPERT ANALYSIS
वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों और आपराधिक कानून के जानकारों का मानना है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह आदेश न्यायिक जवाबदेही तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अक्सर देखा जाता है कि ट्रायल में देरी के कारण गवाह अपने बयानों से मुकर जाते हैं (Hostile Witnesses) और आरोपी पक्ष को इसका सीधा फायदा मिलता है। जब ट्रायल 1 वर्ष के भीतर पूरा होगा, तो दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) में सुधार होगा और अपराधियों में कानून का खौफ पैदा होगा। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जब तक फॉरेंसिक लैब्स की संख्या नहीं बढ़ाई जाती और जांच अधिकारियों पर काम का अत्यधिक बोझ कम नहीं किया जाता, तब तक 60 दिनों में चार्जशीट दाखिल करना एक व्यावहारिक चुनौती बना रहेगा।
आगे क्या / WHAT NEXT
मद्रास हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब: * राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों (SP) और कमिश्नरों को विस्तृत सर्कुलर जारी करेंगे। * उच्च न्यायालय की निगरानी समिति राज्य की सभी विशेष अदालतों से मासिक प्रगति रिपोर्ट (Monthly Compliance Report) तलब करेगी। * तमिलनाडु सरकार को फॉरेंसिक लैब्स में खाली पड़े पदों को भरने और डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुतीकरण प्रणाली को अपग्रेड करने के लिए फंड जारी करना होगा।
मद्रास उच्च न्यायालय का यह कड़ा संदेश स्पष्ट करता है कि बच्चों और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में ढिलाई और प्रक्रियात्मक देरी को अब किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
Source: Google News
*Source: Google News — foolpolitics.in*
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