ब्रेकिंग: मद्रास हाईकोर्ट का सख्त रुख, रेप और POCSO मामलों में अब होगी फास्ट ट्रैक सुनवाई

ब्रेकिंग: मद्रास हाईकोर्ट का सख्त रुख, रेप और POCSO मामलों में अब होगी फास्ट ट्रैक सुनवाई

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**लीड पैरा:** मद्रास हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए राज्य की निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि वे बलात्कार और POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाएं। कोर्ट ने साफ कहा है कि न्याय में देरी पीड़िता के अधिकारों का हनन है। तमिलनाडु में डीएमके (DMK) की सरकार है और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन लगातार महिला सुरक्षा के दावों पर जोर देते रहे हैं, लेकिन अदालतों में लंबित मामलों का अंबार एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।

ब्रेकिंग: मद्रास हाईकोर्ट का सख्त रुख, रेप और POCS

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क्या हुआ / WHAT HAPPENED मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस **एस.एम. सुब्रमण्यम** और जस्टिस **वी. शिवज्ञानम** की खंडपीठ ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य में लंबित पड़े यौन अपराधों के मुकदमों पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि राज्य भर की अदालतों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले पेंडिंग हैं जिनमें चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद ट्रायल सालों से लटका हुआ है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ट्रायल कोर्ट्स को अब इन संवेदनशील मामलों को प्राथमिकता देनी होगी और सुनवाई को 'डे-टू-डे' आधार पर करने का प्रयास करना होगा।

पृष्ठभूमि / BACKGROUND तमिलनाडु में पिछले कुछ वर्षों में महिला सुरक्षा और नाबालिगों के खिलाफ अपराधों के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, लंबित मामलों की संख्या चिंताजनक है। पूर्व में भी कई बार यह मुद्दा उठा है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के बावजूद मुकदमों का निपटारा धीमा है। राज्य में गृह विभाग का जिम्मा खुद मुख्यमंत्री **एम.के. स्टालिन** के पास है। राज्य सरकार ने कई बार दावा किया है कि वे 'महिला सुरक्षा' के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन अदालती प्रक्रिया की सुस्ती ने इस पर सवाल खड़े किए हैं।

आधिकारिक बयान / OFFICIAL STATEMENTS अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा, *"पीड़िता को न्याय मिलने में होने वाली देरी न केवल कानूनी प्रक्रिया का मजाक है, बल्कि यह पीड़िता के मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी गहरा आघात करती है।"* कोर्ट ने यह भी कहा कि विशेष अदालतों (POCSO Courts) में जजों की नियुक्ति और प्रशासनिक संसाधनों की कमी को बहाना बनाकर सुनवाई को टाला नहीं जा सकता। वहीं, राज्य के विधि मंत्री **एस. रघुपति** ने कहा है कि सरकार हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने और अदालतों को आवश्यक बुनियादी ढांचा मुहैया कराने के लिए पूरी तरह तैयार है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया / POLITICAL REACTIONS इस आदेश के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है: * **डीएमके (DMK):** सत्ताधारी दल का कहना है कि वे अदालती सुधारों का स्वागत करते हैं और सरकार पहले से ही फास्ट ट्रैक अदालतों के सुदृढ़ीकरण पर काम कर रही है। * **एआईएडीएमके (AIADMK):** मुख्य विपक्षी दल ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि "राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब है और कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, यह सरकार की विफलता है।" * **भाजपा (BJP):** तमिलनाडु भाजपा इकाई ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह यौन अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाए और मामलों के निपटारे के लिए समय-सीमा तय करे।

कानूनी कार्रवाई / LEGAL ACTION मद्रास हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे उन सभी मामलों की सूची तैयार करें जो 2 साल से अधिक समय से लंबित हैं। * **डायरेक्शन:** सभी जिला न्यायाधीशों को निर्देश दिया गया है कि वे साप्ताहिक आधार पर लंबित मामलों की समीक्षा करें। * **तनाव:** पुलिस विभाग को भी निर्देश दिया गया है कि वे गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और कोर्ट में उनकी उपस्थिति समय पर दर्ज कराएं, ताकि ट्रायल में कोई बाधा न आए। * **विशेष मॉनिटरिंग:** कोर्ट ने कहा है कि वह स्वयं इन मामलों की प्रगति की निगरानी करेगी।

विशेषज्ञ विश्लेषण / EXPERT ANALYSIS कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप गेम-चेंजर साबित हो सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता **जी. राजगोपालन** कहते हैं, "भारत में रेप और POCSO मामलों में दोषसिद्धि (Conviction) की दर कम होने का मुख्य कारण ट्रायल में देरी है। जब ट्रायल लंबा खिंचता है, तो गवाह मुकर जाते हैं या साक्ष्य कमजोर पड़ जाते हैं। कोर्ट का यह निर्देश न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों को जिम्मेदारी के दायरे में लाता है।"

आगे क्या / WHAT NEXT अगली सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से उन अदालतों का विवरण मांगा है जहां जजों के पद रिक्त हैं। साथ ही, सरकार को यह बताना होगा कि फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए जरूरी फंड और स्टाफ की स्थिति क्या है। उम्मीद है कि अगले 3 महीनों के भीतर निचली अदालतों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। राज्य सरकार को अब इन संवेदनशील मामलों के निपटारे की एक ठोस कार्ययोजना (Action Plan) कोर्ट में पेश करनी होगी।

**निष्कर्ष:** मद्रास हाईकोर्ट का यह आदेश न केवल कानूनी प्रक्रिया को गति देने वाला है, बल्कि यह उन हजारों पीड़ितों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो वर्षों से न्याय की बाट जोह रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और न्यायपालिका मिलकर इस दिशा में कितनी तत्परता दिखाते हैं।

Source: Google News

*Source: Google News — foolpolitics.in*

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